रविवार, 19 अगस्त 2012

नेताजी की हुंकार से सरकी कांग्रेस की हवा ।

नेताजी ने लखनऊ से हुंकार क्या भरी , कांग्रेस की हवा सरक गयी तीसरे मोर्चे का नाम सुनते ही । पता नहीं क्यों .....तीसरे मोर्चे का नाम सुनते ही सबसे ज्यादा एलर्जी कांग्रेसियों को होती है । तीसरे मोर्चे की आहट से कांग्रेस फिर बैचेन हैं । अभी आडवानी जी ने चंद दिनों पहले तीसरे मोर्चे के 2014 में सत्तासीन होने की सम्भावना जताई तो कांग्रेस सदमे में जा पहुंची । लेकिन नेताजी श्री मुलायम सिंह जी ने आज जब तीसरे मोर्चे का आधार बनाना आरम्भ किया तो कांग्रेस को अपना कुनबा चुनाव से पहले ही बिखरता नज़र आया । कोई माने या माने .......जब जब राजनीति में समाजवादी संघर्ष परिभाषित होता है तो कांग्रेस को अपना अस्तित्व उसमे डूबता उतराता नज़र आता है । यहाँ हम लोहिया, जेपी और राजनारायण जी के संघर्षों को प्रमाण मान सकते हैं । डॉ राम मनोहर लोहिया के कांग्रेस विरोध और जनसंघी विचारधारा से सम्यक दूरी बनाकर चलने से देश में सशक्त समाजवादी विचारधारा विकसित हुयी और कांग्रेस से ऊब चुके देशवासियों के मन मस्तिष्क में ताजा हवा के लिए एक नई खिड़की खुली । जैसे जैसे समाजवादी विचारधारा मजबूत होती गयी कांग्रेस क्षीण प्रायः होती गयी ।
आज एक बार फिर देश मनमोहन सिंह जी की उबाऊ और कठपुतली सरकार से आजिज़ होकर समाजवादियों की तरफ देख रहा है । घनघोर घोटालों के आरोपों को झेलते निरंतर खोखली होती जा रही कांग्रेस को भी अब अहसास हो चुका है कि  2014 में वापसी संभव नहीं । उधर भाजपा में भी नेतृत्व को लेकर जूतमपैजार की नौबत है । मोदी का दावा है वो प्रधान मंत्री पद के लिए निर्विकार हैं , वहीँ संघ नीतीश कुमार के साथ है । आडवानी जी अकेले पड़ चुके हैं और अपने अनुभव अपने ब्लाग पर बाँट रहे हैं कि  भाजपा चुनाव जीतने की हालत में नहीं । उन्होंने भी सोच समझ कर सत्य ही कहा है कि इस दफा 2014 में तीसरा मोर्चा ही सत्तासीन होगा ,भाजपा या कांग्रेस नहीं |
उत्तर प्रदेश में इस बार समाजवादियों को प्रचंड बहुमत मिला है और लोकसभा चुनाव 2014 की तैयारियों में सबसे अब्बल समाजवादी पार्टी ही है । उत्तर प्रदेश भारत का सबसे बड़ा प्रदेश है और यहीं से सबसे ज्यादा सांसद भी चुने जाते हैं जिनके समर्थन से केंद्र की सरकार बनती है | नेताजी श्री मुलायम सिंह यादव जी भारत वर्ष की राजनीति की तीसरी शक्ति का केंद्र माने जाते है | गैर भाजपाई गैर कांग्रेसी सरकारों में आपका योगदान अप्रतिम रहा है आपने हमेशा सांप्रदायिक शक्तियों से मुकाबला किया है | निश्चित ही यूपी की समाजवादी पार्टी की लोकप्रिय सरकार और जांबाज़ कार्यकर्ताओं के बूते लोकसभा की 60 सीटें जीतना कोई मुश्किल काम नहीं, | एक बार फिर जुझारू समाजवादी कार्यकर्त्ता लक्ष्य 2014 के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करने के तैयार बैठे  है ।

गुरुवार, 16 अगस्त 2012

वास्तविक आजादी - कब तक ?

आज देश अपनी स्वतंत्रता की 65 वीं सालगिरह के गीत गा रहा है | अभिजात्य वर्ग सड़कों पर तिरंगा लिए दौड़ रहा है और आजादी को स्वछंदता के अर्थों में स्थापित कर रहा है | शहीदों को याद करने के लिए आज मेट्रों रेलयात्रियों ने फुर्सत निकाल ही ली और मगर उनकी स्वतंत्रता संग्राम परिचर्चा  घूम फिर कर नेहरु गाँधी परिवार पर आकर समाप्त होती है  |
65 साल बाद आज भी देश की राजधानी से 500 किमी० दूरवर्ती ग्रामों में आजादी का मतलब स्कूली बच्चों के राष्ट्रगान गायन और मिष्ठान्न वितरण तक ही सीमित है | लोग आजादी के वास्तविक अर्थ के नजदीक तक नहीं पहुँच पाए गुजिश्ता 65 सालों में | आज भी भूख और बीमारी हमारे देश में चुनावी मुद्दा बनती है और राजनैतिक दल इस पर सरकारें बनाते आयें हैं | गरीबी आज भी जिन्दा है ........गरीबी हटाओ के नारे को 35 साल होने जा रहे हैं | लेकिन बूढा हुआ जाता ये नारा आज भी उतना ही पैना ,कारगर और लोकप्रिय है जितना अपनी जननी स्व० इंदिरा गाँधी के कार्यकाल में था | 65 सालों में आजाद भारत में जो विकास हुआ  उस विकास का अपहरण मेट्रो शहरों और बड़े नगरों ने कर लिया | विकास बड़े शहरों के आगोश में सदा के लिए खो गया है और इस कारण गाँव से शहर आने वाली सड़के जर्जर और छोटी ही बनी रहीं | शहर चकमक फैक्ट्रियों से अजूबे और देहात उसका उत्सर्जन मात्र बने रहे | यहाँ इंजीनियर और बिजनेस टाइकून काबिल और अर्थव्यवस्था के प्रमुख नियंता समझे जाने लगे और देश का अन्न उत्पादक किसान गंवार और जाहिल की श्रेणी में आ खडा हुआ | कृषि प्रधान देश में कृषि अनपढ़ों और मजदूरों का पेशा बना कर रख दी गयी | नतीजतन भारत में ही दो प्रकार के भारत विकसित होते चले गए | जिनका अंतर देश की शिक्षा ,स्वास्थ्य, न्याय, सुरक्षा सहित कई पहलुओं में स्पष्ट द्रष्टिगोचर होता गया | देश के नीति निर्धारक समस्या को जाने बिना और धरातल की हकीकत को समझे बिना योजनायें बनाते गए | हद तो तब हो गयी जब किसानों से जुड़े मुद्दे ऐसे हाथों तय होने लगे जिन्हें फसलों और पेड़ों तक की जानकारी नहीं थी यानि ऐसे वैद्य के हाथ इलाज ठहराया गया जिसका आयुर्वेद से कोई सम्बन्ध ही न था | सरकारें मात्र अपना कार्य काल ही पूरा किये जाती रहीं | हमारी आधी आबादी आज भी कर्जदार है | हम 65  सालों में देश के दलितों और पिछड़े वर्गों को न्याय नहीं दिला पाए | आज भी हम कुपोषण ,पोलियो ,बेरोजगारी, पीने का पानी, शौचालयों और विद्युत आपूर्ति जैसी समस्याओं से लड़ रहे हैं जबकि ये मुद्दे मेरे हिसाब से आजादी के प्रथम बीस साल में ही हल हो जाने चाहिए थे | 65 सालों बाद आज भी समाजवादी समाज की स्थापना का स्वप्न अधूरा ही है | समता मूलक समाज कहीं भी धरातल पर नज़र नहीं आता। बिना सामाजिक और आर्थिक आजादी प्राप्त किये आजाद होने के कोई मायने नहीं हैं | ये आजादी नहीं है अपितु मैं इसे व्यापक अर्थों में सत्ता का हस्तांतरण मात्र ही समझता हूँ | हो सकता है अनेक लोग मेरी बात से सहमत न हों और सहमत होना आवश्यक भी नहीं, क्योंकि हम बोलने या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को ही अपनी वास्तविक स्वतंत्रता मान बैठे हैं |

रविवार, 12 अगस्त 2012

शर्मसार किया हाकी ने

ओलम्पिक में भारतीय हाकी टीम पूरे देश को शर्मसार कर दिया है | कभी भारतीय खेल जगत का सिरमौर रही हाकी की दशा आज मुंह चिढ़ाती प्रतीत हो रही है | मेजर ध्यान चन्द के मजबूत हाथो में पली बढ़ी हाकी आज अपनी दुर्दशा पर रो रही है | ओलम्पिक सहित एशियाड ,कामनवेल्थ ,एफ्रो एशियन,साउथ एशियन आदि खेलों में हमेशा भारतीय हाकी ही पदक तालिका में लाज बचाती आई थी | लेकिन इस दफा तो रिकार्ड ही बन गया छीछलेदार का | सबसे फिस्सडी साबित हुए भारतीय हाकी शेर | सबसे अंतिम पायेदान पर आई हाकी टीम ने 120 करोड़ भारतीयों का सर शर्म से झुका दिया है | भारतीय टीम एक भी मैच जीतने में नाकाम रही | ओलम्पिक खेलों के इतिहास में इतनी बुरी दुर्गति हाकी टीम कभी नहीं कराई जितनी इस बार | जले पर नमक ये कि भारतीय खिलाड़ी अंतिम मैच हार कर हाथ हिलाते हुए मैदान का चक्कर इस अंदाज में लगा रहे थे मानों कोई पदक जीता हो ,जबकि मैदान पर मौजूद भारतीय दर्शक रो रहे थे और उन पर गुस्से में बोतलें और कागज के गोले फेंक रहे थे |
अब समीक्षाएं होंगी और जांचों का दौर चलेगा | जाँच के नाम पर लीपापोती होगी और दर्शक फिर इस प्रदर्शन को भूल जायेंगे | मैं तो कहता हूँ पूरा हाकी फैडरेशन बर्खास्त होना चाहिए | हाकी तैयारी के नाम पर बरबाद की गयी शासकीय धनराशि को गबन मानते हुए इनसे बसूला जाना चाहिए तभी शायद इन्हें अपनी जिम्मेदारी का अहसास हो |

शनिवार, 11 अगस्त 2012

आखिर ऐसा क्या गलत कह दिया आडवाणी जी ने ?

पता नहीं भाजपा वाले क्यों आडवाणी जी से खार खाये जा रहे हैं | संघ से लेकर बाल ठाकरे और दिल्ली से लेकर गुजरात तक भाजपाई मुँह फुलाए पड़े हैं | बेचारे आडवाणी जी ने अपनी दिल की बात अपने ब्लॉग पर क्या लिखी.... सत्ता  के गलियारों में कोहराम मच गया | जिसे देखो वह टिप्पणी कर रहा है | कोई परास्त सेनापति...... तो कोई थका खिलाड़ी ......तो कोई हताशा का शिकार बता रहा है | सत्ता का ख्वाब पाले बैठे कई प्रतीक्षारत मंत्री आडवाणी जी का ब्लॉग पढते ही धडाम हो गए | आस जाती रही हाथ से कईयों की | मैं ह्रदय से धन्यवाद देना चाहूँगा आडवाणी जी को .....जो उन्होंने सत्य कहने और स्वीकारने का साहस जुटाया | आडवाणी जी का बयान जनभावनाओं की स्वीकारोक्ति है |  पूर्व उपप्रधानमंत्री ने अपने ब्लॉग में एक दम सटीक भविष्यवाणी की है कि 2014 में कांग्रेस या भाजपा की सरकार नहीं बनने जा रही | यानि महंगाई और भ्रष्टाचार का पर्याय बन चुकी कांग्रेस सरकार अपना बहुमत लोकसभा चुनाव 2014  में खो देगी और UPA 2 का अगला सीक्वल बनाने का कांग्रेसी सपना पूरा नहीं होगा | साथ साथ आडवाणी जी ने ये भी स्वीकारा है कि भाजपा भी बहुमत के आस पास नहीं आने वाली | इस अवश्यम्भावी परिवर्तन के मूल में लगातार पिछले 15 वर्षों से देश की राजनीति के केंद्र में बारी बारी से दो प्रमुख दलों का ही सत्तासीन होना है | लोगों ने केंद्र में भाजपा का विकल्प कांग्रेस तय किया और कांग्रेस ने निराश करते हुए प्रायः हर क्षेत्र में भ्रष्टाचार के नए नए कीर्तिमान स्थापित किये | लोग चाह कर भी सुरसा की भांति बढ़ती महंगाई ,भ्रष्टाचार और उसमे से निकले 2G , CWG ,स्पैक्ट्रम, राजा, कनमोझी, कलमाड़ी कैसे चरित्रों को भूल नहीं पा रहे हैं | उधर भाजपा की अंतर्कलह भी कम नहीं है | 2014 तक सिर फुटौवल की स्थिति आ जाये तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए | अब ये स्पष्ट हो गया है कि अब भाजपा में प्रधानमंत्री पद के लिए आडवाणी जी स्वाभाविक और निर्विवाद नेता नहीं रहे | मोदी और अब नीतीश कुमार उनके कद और पद के समक्ष आ चुके हैं | आज ही संघ प्रमुख ने मोदी के मुकाबले नीतीश सरकार को ज्यादा अंक देकर भाजपाई खेमे में खलबली मचा दी है | भाजपा में निरंतर कमजोर पड़ते जा रहे आडवाणी जी अपनी स्थिति और अति आत्मविश्वास से लबरेज ड्राइंगरूम पालिटिक्स के माहिर भाजपाई मसनदी नेताओं की असलियत बखूबी जानते हैं | इसलिए उन्होंने सोच समझ कर सर्वथा सत्य ही कहा है कि इस दफा 2014 में तीसरा मोर्चा ही सत्तासीन होगा ,भाजपा या कांग्रेस नहीं |
हम सब जानते है कि उत्तर प्रदेश भारत का सबसे बड़ा प्रदेश है और यहीं से सबसे ज्यादा सांसद भी चुने जाते हैं जिनके समर्थन से केंद्र की सरकार बनती है | इस दफा समाजवादी पार्टी को 2012 विधान सभा चुनाव में प्रचंड बहुमत मिला है | नेताजी श्री मुलायम सिंह यादव जी भारत वर्ष की राजनीति की तीसरी शक्ति का केंद्र माने जाते है | गैर भाजपाई गैर कांग्रेसी सरकारों में आपका योगदान अप्रतिम रहा है आपने हमेशा सांप्रदायिक शक्तियों से मुकाबला किया है | निश्चित ही यूपी की समाजवादी पार्टी की लोकप्रिय सरकार और जांबाज़ कार्यकर्ताओं के बूते लोकसभा की 60 सीटें जीतना कोई मुश्किल काम नहीं, | ऐसा होते ही समाजवादी परचम देहली के गगन में लहरा जाए तो अतिश्योक्ति न होगी |
आडवाणी जी का ब्लॉग पढ़े http://blog.lkadvani.in/blog-in-hindi/%E0%A4%B8%E0%A4%A8%E0%A5%8D-2014-%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%82-%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%82%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%87%E0%A4%B8-%E0%A4%95%E0%A5%87-%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%AF

सोमवार, 2 जुलाई 2012

हार्दिक धन्यवाद नेता जी श्री मुलायम सिंह एवं आभार समाजवादी पार्टी

समाजवादी पार्टी ने अपने घोषणापत्र में उल्लिखित मछुआ /निषाद जातियों के SC आरक्षण की दिशा पहल करते हुए कार्यवाही आरम्भ कर दी है | माननीय मुख्यमंत्री श्री अखिलेश यादव जी द्वारा मछुआ /निषाद जातियों सहित 17 पिछड़ी जातियों को अनुसूचित जाति में शामिल करने के उद्देश्य से प्रभावी कदम उठाते हुए मंत्रियों की समिति बनाने पर हार्दिक धन्यवाद एवं आभार ज्ञापित |
          प्रदेश सरकार के इस कदम से इन वर्गों में अखिलेश सरकार के प्रति विश्वास और अधिक मजबूत हुआ है | इस प्रस्तावित SC आरक्षण से उत्तर प्रदेश की 17 पिछड़ी जातियों के डेढ़ करोड़ लोग लाभान्वित होंगे और अब तक विकास की किरण से महरूम रहा मछुआ /निषाद समुदाय समाज की मुख्य धारा में आएगा | मछुआ समुदाय अपने प्रस्तावित अनुसूचित जाति आरक्षण की लड़ाई में समाजवादी पार्टी को हर सहयोग करने को तैयार है | निसंदेह अब हमारी भावनाओं के अनुरूप प्रस्ताव तैयार होगा जो अति शीघ्र विधानसभा से पास होकर केंद्र सरकार को भेजा जायेगा | समाजवादी पार्टी अपने सांसदों की ताक़त से इस प्रस्ताव को केंद्र सरकार से मंजूर करा कर रहेगी | स्पष्ट हो गया कि समाजवादी पार्टी जो कहती है वो करती है | कथनी करनी में कोई भेद नहीं | हमारे नेता आदरणीय मुलायम सिंह जी की नीति और नीयत बिलकुल साफ़ है | हमें नेता जी श्री मुलायम सिंह यादव पर पूर्ण विश्वास है |

मंगलवार, 19 जून 2012

राष्ट्रपति चुनाव और समाजवादी पार्टी

राष्ट्रपति चुनाव का बिगुल बज चुका है । केंद्र में सरकार संचालक होने के नाते कांग्रेस दल की जिम्मेदारी है कि  वो देश को एक निष्पक्ष ,योग्य और उर्जावान राष्ट्रपति दे । यह सत्य है कि केंद्र की कांग्रेस सरकार पूर्ण बहुमत में नहीं है और राष्ट्रपति चुनाव में सर्वसम्मति और सभी दलों को साथ लेकर चलने की मंशा रखती है । बेहतर होता कि भारत का राष्ट्रपति दलीय सीमाओं से ऊपर उठकर निर्विरोध चुना जाता । इससे जहाँ स्वस्थ संवैधानिक परंपरा स्थापित होती वहीँ राष्ट्रपति पर दल विशेष का मोहरा या ठप्पा होने का दाग भी नहीं लगता । किन्तु बहुमत की संसदीय परंपरा में सत्तारूढ़ दल भी अपना बहुमत साबित करने में पीछे नहीं रहना चाहेगा । कांग्रेस द्वारा नामित वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी को पुराना संसदीय अनुभव है और वे लगातार किसी न किसी पद पर रहकर देश को अपनी सेवाएँ देते रहे हैं ।
कांग्रेस पार्टी ने राष्ट्रपति के इस चुनाव में समाजवादी पार्टी की महति भूमिका को बहुत पहले ही जान लिया था  है । बिना समाजवादी पार्टी के सहयोग के कांग्रेस का राष्ट्रपति चुना जाना असंभव कार्य था । कांग्रेस के राष्ट्रपति प्रत्याशी प्रणब मुखर्जी का समाजवादी पार्टी ने समर्थन कर देश को मध्यावधि चुनाव से बचाया है ।महंगाई से जूझती जनता पर अनावश्यक
मध्यावधि चुनाव लादने से अच्छा था कि कांग्रेस के प्रत्याशी का समर्थन किया जाए । ये बात गौर करने लायक है कि यदि कांग्रेस का प्रत्याशी चुनाव हार जाता और भाजपा का प्रत्याशी जीतता तो प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह को नैतिकतावश  इस्तीफ़ा देना पड़ता, देश मध्यावधि चुनाव की चपेट में आता और अगली बार भाजपा को दोगुनी ताक़त से सत्ता में आने कोई नहीं रोक पाता । इस प्रकार समाजवादी पार्टी ने दूरदर्शिता का परिचय देकर जहाँ देश को अनावश्यक मध्यावधि चुनाव से मुक्ति दिलाई बल्कि भाजपा की कमर तोड़ने का काम भी किया है ताकि 2014 तक भाजपा सिर्फ अफ़सोस ही मनाती रहे । सांप्रदायिक शक्तियों से समाजवादी पार्टी सदैव मुकाबला करती रही है और आगे भी करती रहेगी ।
नेताजी श्री मुलायम सिंह यादव के कुशल दिशा निर्देशन में राष्ट्रपति चुनाव में लगातार दूसरी बार समाजवादी पार्टी ने अपनी उच्च रणनैतिक क्षमता , आत्मविश्वास और अहमियत को प्रमाणित किया है | डॉ लोहिया का कथन सत्य साबित हुआ कि भारतीय राजनीति में समाजवादी आन्दोलन की भूमिका सदैव प्रभावी, प्रासंगिक, अग्रणी और निर्णायक रहेगी एवं समाजवादियों व समाजवाद को उपेक्षित करने वाली सत्ता ज्यादा दिनों तक चल नहीं पायेगी |

शनिवार, 16 जून 2012

कन्नौज के मायने ....

कन्नौज लोकसभा उपचुनाव में सपा प्रत्याशी श्रीमती डिम्पल यादव  के निर्विरोध निर्वाचन ने समाजवादियों को जश्न मनाने का जल्द ही दूसरा अवसर प्रदान किया है । कार्यकर्त्ता खुश भी हैं और हतप्रभ भी, कि उन्हें प्रचार और अपनी क्षमता प्रदर्शित करने  का भरपूर मौका हाथ से जाते दिखा | वहीँ जनता में संतोष की लहर है कि कन्नौज का सीधा दोहरा सम्बन्ध विकास से जुड़ गया है । इस सब के बीच फिरोजाबाद कहीं पीछे छूटता नज़र आया ।
यकीनन अगर फिरोजाबाद सामने नहीं आता तो कन्नौज भी नहीं हुआ होता । फिरोजाबाद ने समाजवादियों को संभलने और अपने संघर्ष को पुनर्परिभाषित करने पर मजबूर तो किया ही,  साथ ही मुखरता के साथ जनसमस्याओं से भिड़ने का माद्दा भी पैदा किया । आताताई मायाराज से समाजवादियों का संघर्ष मुखरित हुआ तो लखनऊ को भी लाल रंग में रंगते देर न लगी । लूट तंत्र से आजिज़ जनता ने भी अपने सही पैरोकारों को पहचानने में भूल नहीं की और समाजवादियों को नेताजी के बेमिसाल संघर्षों और अनुभवों में पिरोया एक नया सशक्त  ,युवा ,विकसित और जमीनी हस्ताक्षर युक्त नेतृत्व मिला ।
कन्नौज विजय वास्तव में अनूठी तो है ही ,स्पष्ट कर रही है कि  आने वाले लोकसभा चुनाव में प्रायः हर सीट पर यही स्थिति  होने वाली है । विधान सभा चुनाव में पड़ी जबरदस्त मार से विपक्ष अभी तक सीधा भी नहीं हो पाया है । समाजवादी पार्टी के विरुद्ध प्रत्याशी चुनने में विपक्षियों को नाकों चने चबाने पड़  रहे हैं । ये हाल तब है जब कि दूसरे दलों के नेताओं का सपा में प्रवेश फिलहाल बंद है और शीर्ष नेतृत्व के निर्देश पर ही चंद  लोगों की इंट्री हुयी है । प्रतिबन्ध हटते  ही जो भगदड़ विपक्षी दलों में मचने वाली है ,उसका अंदाजा भर कन्नौज से लगाया जा सकता है । वास्तव में कन्नौज समाजवादियों का मक्का है । डॉ लोहिया की कर्मस्थली कन्नौज  में पुष्पित पल्लवित समाजवादी विचारधारा को परवान चढ़ते देखना निसंदेह देश वासियों के लिए एक सुखद अनुभव तो है ही भारतीय राजनीति  में समाजवाद की आवश्यकता और प्रासंगिकता को भी घोषित करता है ।
2014 समाजवादियों के असल दमखम की परीक्षा लेने वाला है जिसकी पटकथा कन्नौज लिख चुका है ।